इलाइची की खेती कैसे करें- Cardamom farming in Hindi [पूरी जानकारी]

आप सभी तो जानते ही होंगे की देश सहित पूरे विश्व में इलाइची की खपत कितनी है। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि, इसकी कीमत 1400 से 1500 प्रति किलो तक जाती है।  इसी वजह से इसकी खेती काफी महत्पूर्ण है। यदि आप जानना चाहते हैं कि इलाइची की खेती कैसे करें (Cardamom farming in Hindi), तो यह लेख आपके लिए बहुत ही महत्वपूर्ण साबित होने वाला है।  इसमें हम इलाइची कि खेती से संबधित सभी महत्वपूर्ण जानकारी साझा करने कि कोसिस करेंगे, जिससे आपको सारी जानकारी एक ही जगह प्राप्त हो सके।

आईये सबसे पहले जानते है कि इलाइची कि कितनी किस्में होती हैं ?

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इलाइची की किस्में

इलाइची की खेती कैसे करें- Cardamom farming in Hindi

अगर बात करें इलाइची कि उन्नत किस्मो कि तो यह मुख्या रूप से दो प्रकार कि होती है:

  • सफ़ेद इलाइची या हरी इलाइची। 
  • काली इलाइची। 

सफ़ेद इलाइची या हरी इलाइची

सफ़ेद इलाइची, जिसे हरी इलाइची भी कहते हैं, हम मसाले के रूप में तथा माउथ फ्रेशनर के रूप में भी इस्तेमाल करते है। ज्यादातर इसका इस्तेमाल माउथ फ्रेशनर के रूप में ही किया जाता है फिर चाहे वो पान में डाल कर करें या फिर अलग से पैकेजिंग करके। इन दिनों मार्किट में कोटेड इलाइची का व्यपर बहुत ही जोर शोर से चल रहा है। कई नामी कम्पनिया इस व्यापार में उतरी हुई हैं। 

काली इलाइची

काली इलाइची को ज्यादातर मसाले के रूप में ही इस्तेमाल किया जाता है।  यह हरी इलाइची से साइज में बड़ी होती है इसलिए इसे बड़ी इलाइची  भी कहा जाता है। इसकी भी दो किस्मे आती हैं। अगर आप मसालों का व्यापार करना चाहते हैं तो बड़ी इलाइची कि खेती आपके लिए बहुत ही फायदेमंद है। इसकी खेती करके आप कच्चा माल भी बेच सकते है और अच्छी खासी कमाई कर सकते हैं। 

खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी और जलवायु

इलाइची की खेती के लिए 5 से 7.5 के बीच के pH मान कि मिट्टी तथा लाल दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है।  परन्तु, आप अच्छी तरह से देख रेख करके इसे अन्य मिट्टियों पर भी ऊगा सकते हैं। अगर बात करें जलवायु कि तो, इलाइची कि खेती के लिए उष्णकटिबंधीय जलवायु  सबसे उत्तम होती है जोकि देश के कर्नाटक, केरल और तमिलनाडू में पायी जाती है।  यही कारण है कि देश के इन राज्यों में इलाइची कि खेती सबसे ज्यादा होती है। 

जुताई और पौधारोपण

इसकी खेती के आपको गहरी जुताई करके पहले से कि गई खेती के अपशिष्ट को दबा देना चाहिए। इसके बाद, मेड़बंधी करना अतिआवश्यक है जिससे कि खेत में पानी का संरक्षण अच्छे से हो सके। पानी भरने के बाद रोटावेटर से जुताई सबसे अच्छी होती है, जिससे कि अपशिष्टों को छोटा बारीक कर अछि तरह मिट्टी में दबा दिया जाय। 

मिट्टी में रासायनिक या फिर जैविक खाद को अच्छी तरह से मिला दे और याद रहे, ये प्रक्रिया पौधारोपण से 14 से 15 दिन पहले किया जाना चाहिए। अब मेड बन कर बीज लगाना ज्यादा उपयुक्त है अच्छी पैदावार के लिए।  हालाँकि, आप ऐसे भी पौध लगा सकते है बस उचित डडूरी का ख्याल रखना होगा।

अब आपकी मिट्टी तैयार हो चुकी है। अब बारी आती है पौध तैयार करने की।

इलाइची कि खेती के लिए पौधरोपण कुछ धन कि खेती से मिलता जुलता है।  जिस प्रकार धन कि खेती के लिए पहले बीज तैयार किया जाता है , ठीक उसी प्रकार इलाइची कि खेती के लिए भी इसके बीज को नर्सरी में तैयार किया जाता है। 10 सेंटीमीटर कि दूरी पे बीज लगाकर पौधे तैयार किये जाते हैं। 

खेत में लगाने के लिए करीब एक फिट की लम्बाई के पौधे उपयुक्त होते हैं। जब पौधे तैयार हो जाएँ तो इन्हे ट्राइकोडर्मा से उपचारित कर लें और एक हेक्टेयर के लिए करीब 1 से 1.25 किलो बीज पर्याप्त होता है।  

देख-रेख तथा सिंचाई

खेत में पौधे लगाने के बाद उसकी देख-रेख बहुत ही आवश्यक है, अच्छी देख-रेख के अभाव में पैदावार पर प्रभाव पद सकता है और आप अच्छी फसल से दूर हो सकते हैं। देख-रेख में मुख्यतः दो बातों का ध्यान रखना चाहिए: समय समय पर सिंचाई और खरपतवार से रक्षण। 

अगर बात करें सिंचाई कि तो, पौधारोपण के तुरंत बाद ही सिंचाई कर देना उपयुक्त होता है। और नियमित रूप से खरपतवार कि निराई करते रहना चईये जिससे कि पौधों का विकास अच्छी तरह से हो सके। 

लगने वाले रोग तथा उनके रोकथाम

इलाइची के पौधों पर मुख्यतः तीन रोग लग सकते हैं :

प्रथम: ब्रिंग लार्वा

ब्रिंग लार्वा का रोग एक किट जनित रोग हैं जिससे पौधे के नर्म भागों को सबसे ज्यादा नुकसान होता है। इसके रोकथाम के लिए पौधे पर बेसिलस का छिडकाव करना सबसे उचित उपाय माना जाता है।

द्वितीय: सफेद मक्खी

इस रोग से पौधे कि वृद्धि थम सी जाती है।  इस रोग कि पहचान के लिए पौधे कि पत्तियों के निचले भाग में धायण से देखने पर दिखेगा कि, सफ़ेद रंग कि मक्खियां इससे लिपटी होती हैं। ये मक्खियां पत्ते के रास को चूस लेती है जिससे पौधे का विकास रुक जाता है।  इससे रोकथाम के लिए कास्टिक सोडा और नीम के पानी को मिलाकर पत्तों पर छिड़कें। 

झुरमुट और फंगल रोग

झुरमुट और फंगल रोग लगने के बाद पौधे कि पत्तियां सूख जाती हैं और पौधा मुरझा जाता है।  इस रोग के लगने के बाद आप कुछ नहीं कर सकते है सिवाय इसको उखड़कर नष्ट करने के अलावा। हालाँकि, पौदे कि रोपाई से पहले यदि पौधे को ट्राइकोडर्मा से उपचारित करके खेत में लगाएं तो इस रोग से रोकथाम हो सकती है। 

पैदावार और होने वाला लाभ 

इलाइची की खेती कैसे करें (Cardamom farming in Hindi): इलाइची का पौधा लगभग तीन साल बाद पैदावार शुरू करता है।  एक हेक्टेयर से सुखी हुई इलायची की होने वाली पैदावार लगभग 130 से 150 किलो के आसपास की होती है। इसको बाजार में करीब 1500 से 2000 रूपये प्रति किलो तक बेचा जाता है। इस प्रकार किसान भाई इलाइची की खेती करके एक बार में दो से तीन लाख तक की कमाई आसानी से कर सकतें हैं। 

इलाइची की खेती सम्बंधित प्रश्न और उनके उत्तर

प्रश्न 1- इलायची की खेती सबसे ज्यादा कहां होती है?

उत्तर– देश के कर्नाटक, केरल और तमिलनाडू में सबसे ज्यादा इलाइची की खेती होती है। 

प्रश्न 2- इलायची का पौधा कितने दिन में फल देता है?

उत्तर- लगभग तीन साल में इलाइची का पौधा फल देने लगता है। 

प्रश्न 3- सबसे ज्यादा इलाइची कि पैदावार किस राज्य में होती है?

उत्तर– देश के केरल राज्य में सबसे ज्यादा इलाइची की पैदावार होती है।

प्रश्न 4- इलाइची के बीज कहा मिलेंगे?

उत्तर– इसके लिए आप निकटम किसान सेवा केंद्र से सम्पर्क कर सकते हैं या फिर निकटम बीज भंडार पे विजिट करें। 

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